Sunday, July 12, 2015

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है / दुष्यंत कुमार

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है / दुष्यंत कुमार

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है
Dushyant kumar.jpg
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए

यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम

तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है

इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ

हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

अपनी गंध नहीं बेचूंगा- ओमप्रकाश शर्मा

चाहे सभी सुमन बिक जाएं
चाहे ये उपवन बिक जाएं
चाहे सौ फागुन बिक जाएं
पर मैं गंध नहीं बेचूंगा- अपनी गंध नहीं बेचूंगा

जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई
लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई
इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें
चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें


ओ मुझ पर मंडरानेवालों
मेरा मोल लगानेवालों
जो मेरा संस्कार बन गई वो सौगंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा-जाएगा
दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा
कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझारों का रोना-धोना
मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू-टोना

ओ नीलम लगानेवालों
पल-पल दाम बढानेवालों
मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनुबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।


मुझको मेरा अंत पता है पंखुरी-पंखुरी झर जाऊंगा
लेकिन पहिले पवन-परी संग एक-एक के घर जाऊंगा
भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी
उस दिन ये मंडी समझेगी किसको कहते हैं खुद्दारी
बिकने से बेहतर मर जाऊं अपनी माटी में झर जाऊं
मन ने तन पर लगा दिया जो वो प्रतिबंध नहीं बेचूंगा

अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मुझसे ज्यादा अहं भरी है ये मेरी सौरभ अलबेली
नहीं छूटती इस पगली से नीलगगन की खुली हवेली
सूरज जिसका सर सहलाए उसके सर को नीचा कर दूं?
ओ प्रबंध के विक्रेताओं
महाकाव्य के ओ क्रेताओं
ये व्यापार तुम्हीं को शुभ हो मुक्तक छंद नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।-                ओमप्रकाश शर्मा

Tuesday, July 7, 2015

काम और नाम दोनों साथ-साथ चलते हैं / बालकृष्ण भट्ट

नाम के कायम रखने को आदमी न जानिये क्‍या-क्‍या काम करता है। लोग कुआँ खुदाते हैं। बावली बनवाते हैं। बाग लगाते हैं। मोहफिल सजाते हैं। क्षेत्र और सदाबर्त चलाते हैं। नाम ही के लिए लोग लाखों लुटाते हैं। स्‍कूल पाठशाला और अस्‍पताल कायम करते हैं। इस तरह पर काम और नाम दोनों को बराबर साथ निभाता चला जाता है। सच कहो तो इस असार संसार में जन्‍म पाय ऐसा ही काम कर चले जिसमें नाम बना रहे जिन का नाम बना रहता है वे मानो सदा जीते ही रहते हैं। जिस काम से नाम न हुआ वह काम ही व्‍यर्थ है। काम भी दो तरह के होते हैं नेक और बद। नेक काम से आदमी का नेक नाम होता है प्राय: स्‍मरणीय होता पुण्‍य श्‍लोक कहलाता है। बद काम से बदनाम होता है उसका नाम लेते लोग घिनाते हैं- गालियाँ देते हैं। नाक और भौं सिकोड़ने लगते हैं-
   कथापि खलु पापानामलमश्रेयसेयत:,
              पुण्‍य श्‍लोकयथा
   पुण्‍य श्‍लोको नलोराजा पुण्‍यश्‍लोको युधिष्ठिर:।
   पुण्‍यश्‍लोकाच वैदेही पुण्‍यश्‍लोको जनार्दन:।।
   कर्कोटकस्‍य नागस्‍य दमयन्‍त्‍या नलस्‍यच।
   ऋतुपर्णस्‍य राजर्षे: कीर्तनं पाप नाशनम्।। 
 इत्‍यादि नेकनामी के अनेक उदाहरण हैं केवल अपने-अपने काम ही से लोग नेकनाम हो गये। रणजीत सिंह, शिवा जी प्रभृति शूर वीर, विद्यासागर सरीखे देश 
हितैषी, लार्ड रिपन से शासन कर्ता, शेक्‍सपीयर, मिलटन, कालिदास आदि कवि सब अपने-अपने काम ही से हम लोगों के बीच मानो जी रहे हैं और आचन्‍द्रतारक जीते
 रहेंगे। काम के जरिये नाम कायम रखने के तरीकों में किसी ठठोल ने एक यह तरीका भी लिखा है।
घटं भिन्‍द्यात्‍पटं छिन्‍द्या द्रर्दभारोहणं चरेत्।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्ध: पुरुषो भवेत।।
घड़े फोड़ डाले, कपड़े फाड़ डाले, गदहे पर सवार हो कर चले। किसी न किसी तरह मनुष्‍य नाम हासिल करे। कितने हलाकू, चंगेज नादिर से जगत शत्रु ऐसे भी हो गये हैं जिनके काम की चर्चा सुन गर्भवती के गर्भ गिर पड़ते हैं। कितने नाम के लिये मर मिटते हैं। जग में मुँह उजला रहे बात न जाये कोई नाम न रखे एक की जगह चाहे दस लूटे पर ऐसा काम न बन पड़े कि सब लोग हँसें-नाम रखते हैं, नाम करते हैं, नाम धरते हैं, नाम धराते हैं, नाम पड़ता है, नाम चलता है, इत्‍यादि अनेक मुहावरें नाम के हमारी रोजमर्रे की बातचीत में कहे सुने जाते हैं पर इन सबों से नाम का काम ही की तरफ इशारा रहता है। ईश्‍वर न करे बुरे लोगों के लिये किसी का नाम निकल पड़े। दूसरा भी कोई बुरा काम करे तो भी 'नरक पड़ै को चन्‍दू चाचा' समाज में उसी की तरफ सबों की ओर से अंगुश्‍तनुमाई की जायेगी जो बुरे कामों के लिए प्रसिद्ध हो चुका है। पुलिस भी उसी को तके रहेगी। मजिस्‍ट्रेट साहब जुदा उसकी खोज में रहेंगे। यों ही भले काम के लिए नाम निकल गया तो चाहो दूसरा भी कोई वैसा ही काम करे किन्‍तु देसी परदेसियों में नाम उसी का लिया जायगा 'कटै सिपाही नाम सरदार का' 'नाम शाह कमा खा, नामी चोर मारा माय' जो बात बिना उस तरह के काम के होती है वह बराय नाम को कही जाती है। जैसा ईसाई मत के मानने वालों में ईशा पर विश्‍वास बराय नाम की है। इन दिनों के सभ्‍यों में सच्‍ची सभ्‍यता बराय नाम को है। मेनचेस्‍टर के बने कपड़ों के आगे देशी कपड़ों की कदर बराय नाम को है। इस समय के ब्राह्मणों में द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी आदि उपाधि बराय नाम है 'पढ़े लिखे ओनवौ ना ही नाम मुहम्‍मद फाजिल' चार वेद की कौन कहे चार अक्षर से भी भेंट नहीं है। कोरे लंठदास पर कहलाने को द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी। तरह इस साल वर्षा और खेती में उपज बराय नाम को है। दिवालदार रोजगारियों में ईमानदारी बराय नाम है। अंगरेज और हिन्‍दुस्‍तानियों के मुकाबिले हाकियों को इनसाफ बराय नाम है। कितनों का नाम दाम के कारण नाम के लायक कोई काम उनसे न भी बन पड़ा हो तो भी दाम ऐसी चीज है कि उनका नाम लेना कैसा वरन खुशामद करना पड़ता है। ऊपर की वर्षा समान गोधन दास तिनकौड़ी मल चिथरू दास के नामों में कौन-सी खूबसूरती है। इत्तिफाक से ऐसों के पास बहुत-सा रुपया जुड़ गया न आप पेट भर खाता है न दूसरों को खाते पहनते देख सकता है न उस रुपये से यह लोक परलोक का कोई काम निकलता है। समाज में यहाँ तक मनहूस समझा गया है कि सबेरे भूल से कहीं नाम जबान पर आ जाय तो दिन का दिन नष्‍ट हो जाय। ऐसों से सरोकार केवल दास ही के कारण लोग रखते हैं और हाजतरफा करने की भाँति उसके पास जाना पड़ता है इत्‍यादि काम और नाम का विवरण पढ़ने वालों के चित्त विनोदार्थ यहाँ पर लिखा गया। अंत में इतना और विशेष वक्‍तव्‍य है कि काम और नाम दोनों का साथ दाम पल्‍ले रहने से अच्‍छा निभ सकता है अर्थात दाम वाला चाहे तो अपने कामों से नाम पैदा करना उसके लिये जैसा सहज है वैसा औरों के लिये नहीं है।
जुलाई-अगस्‍त,1896 ई.
 

मैं तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक

मैं तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक
रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा
तुम ग़ज़ल बन गईं, गीत में ढल गईं
मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा

ज़िन्दगी के सभी रास्ते एक थे
सबकी मंज़िल तुम्हारे चयन तक रही
अप्रकाशित रहे पीर के उपनिषद्
मन की गोपन कथाएँ नयन तक रहीं
प्राण के पृष्ठ पर प्रीति की अल्पना
तुम मिटाती रहीं मैं बनाता रहा


एक ख़ामोश हलचल बनी ज़िन्दगी
गहरा ठहरा हुआ जल बनी ज़िन्दगी
तुम बिना जैसे महलों मे बीता हुआ
उर्मिला का कोई पल बनी ज़िन्दगी
दृष्टि आकाश में आस का इक दीया
तुम बुझाती रहीं, मैं जलाता रहा


तुम चली तो गईं, मन अकेला हुआ
सारी यादों का पुरज़ोर मेला हुआ
जब भी लौटीं नई ख़ुश्बुओं में सजीं
मन भी बेला हुआ, तन भी बेला हुआ
ख़ुद के आघात पर, व्यर्थ की बात पर
रूठतीं तुम रहीं मैं मनाता रहा

निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे !

कुछ छोटे सपनो के बदले,
बड़ी नींद का सौदा करने,
निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे 
!
वही प्यास के अनगढ़ मोती,
वही धूप की सुर्ख कहानी,
वही आंख में घुटकर मरती,
आंसू की खुद्दार जवानी,
हर मोहरे की मूक विवशता,चौसर के खाने क्या जाने
हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे
निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे !


कुछ पलकों में बंद चांदनी,
कुछ होठों में कैद तराने,
मंजिल के गुमनाम भरोसे,
सपनो के लाचार बहाने,

जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे,
उन के भी दुर्दम्य इरादे, वीणा के स्वर पर ठहरेंगे
निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे 

                                                                                         - ओमप्रकाश  शर्मा