Sunday, July 12, 2015

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है / दुष्यंत कुमार

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है / दुष्यंत कुमार

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है
Dushyant kumar.jpg
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए

यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो—
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

मस्लहत—आमेज़ होते हैं सियासत के क़दम

तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है

इस क़दर पाबन्दी—ए—मज़हब कि सदक़े आपके
जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ

हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

अपनी गंध नहीं बेचूंगा- ओमप्रकाश शर्मा

चाहे सभी सुमन बिक जाएं
चाहे ये उपवन बिक जाएं
चाहे सौ फागुन बिक जाएं
पर मैं गंध नहीं बेचूंगा- अपनी गंध नहीं बेचूंगा

जिस डाली ने गोद खिलाया जिस कोंपल ने दी अरुणाई
लक्षमन जैसी चौकी देकर जिन कांटों ने जान बचाई
इनको पहिला हक आता है चाहे मुझको नोचें तोडें
चाहे जिस मालिन से मेरी पांखुरियों के रिश्ते जोडें


ओ मुझ पर मंडरानेवालों
मेरा मोल लगानेवालों
जो मेरा संस्कार बन गई वो सौगंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मौसम से क्या लेना मुझको ये तो आएगा-जाएगा
दाता होगा तो दे देगा खाता होगा तो खाएगा
कोमल भंवरों के सुर सरगम पतझारों का रोना-धोना
मुझ पर क्या अंतर लाएगा पिचकारी का जादू-टोना

ओ नीलम लगानेवालों
पल-पल दाम बढानेवालों
मैंने जो कर लिया स्वयं से वो अनुबंध नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।


मुझको मेरा अंत पता है पंखुरी-पंखुरी झर जाऊंगा
लेकिन पहिले पवन-परी संग एक-एक के घर जाऊंगा
भूल-चूक की माफी लेगी सबसे मेरी गंध कुमारी
उस दिन ये मंडी समझेगी किसको कहते हैं खुद्दारी
बिकने से बेहतर मर जाऊं अपनी माटी में झर जाऊं
मन ने तन पर लगा दिया जो वो प्रतिबंध नहीं बेचूंगा

अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।

मुझसे ज्यादा अहं भरी है ये मेरी सौरभ अलबेली
नहीं छूटती इस पगली से नीलगगन की खुली हवेली
सूरज जिसका सर सहलाए उसके सर को नीचा कर दूं?
ओ प्रबंध के विक्रेताओं
महाकाव्य के ओ क्रेताओं
ये व्यापार तुम्हीं को शुभ हो मुक्तक छंद नहीं बेचूंगा
अपनी गंध नहीं बेचूंगा- चाहे सभी सुमन बिक जाएं।-                ओमप्रकाश शर्मा

Tuesday, July 7, 2015

काम और नाम दोनों साथ-साथ चलते हैं / बालकृष्ण भट्ट

नाम के कायम रखने को आदमी न जानिये क्‍या-क्‍या काम करता है। लोग कुआँ खुदाते हैं। बावली बनवाते हैं। बाग लगाते हैं। मोहफिल सजाते हैं। क्षेत्र और सदाबर्त चलाते हैं। नाम ही के लिए लोग लाखों लुटाते हैं। स्‍कूल पाठशाला और अस्‍पताल कायम करते हैं। इस तरह पर काम और नाम दोनों को बराबर साथ निभाता चला जाता है। सच कहो तो इस असार संसार में जन्‍म पाय ऐसा ही काम कर चले जिसमें नाम बना रहे जिन का नाम बना रहता है वे मानो सदा जीते ही रहते हैं। जिस काम से नाम न हुआ वह काम ही व्‍यर्थ है। काम भी दो तरह के होते हैं नेक और बद। नेक काम से आदमी का नेक नाम होता है प्राय: स्‍मरणीय होता पुण्‍य श्‍लोक कहलाता है। बद काम से बदनाम होता है उसका नाम लेते लोग घिनाते हैं- गालियाँ देते हैं। नाक और भौं सिकोड़ने लगते हैं-
   कथापि खलु पापानामलमश्रेयसेयत:,
              पुण्‍य श्‍लोकयथा
   पुण्‍य श्‍लोको नलोराजा पुण्‍यश्‍लोको युधिष्ठिर:।
   पुण्‍यश्‍लोकाच वैदेही पुण्‍यश्‍लोको जनार्दन:।।
   कर्कोटकस्‍य नागस्‍य दमयन्‍त्‍या नलस्‍यच।
   ऋतुपर्णस्‍य राजर्षे: कीर्तनं पाप नाशनम्।। 
 इत्‍यादि नेकनामी के अनेक उदाहरण हैं केवल अपने-अपने काम ही से लोग नेकनाम हो गये। रणजीत सिंह, शिवा जी प्रभृति शूर वीर, विद्यासागर सरीखे देश 
हितैषी, लार्ड रिपन से शासन कर्ता, शेक्‍सपीयर, मिलटन, कालिदास आदि कवि सब अपने-अपने काम ही से हम लोगों के बीच मानो जी रहे हैं और आचन्‍द्रतारक जीते
 रहेंगे। काम के जरिये नाम कायम रखने के तरीकों में किसी ठठोल ने एक यह तरीका भी लिखा है।
घटं भिन्‍द्यात्‍पटं छिन्‍द्या द्रर्दभारोहणं चरेत्।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्ध: पुरुषो भवेत।।
घड़े फोड़ डाले, कपड़े फाड़ डाले, गदहे पर सवार हो कर चले। किसी न किसी तरह मनुष्‍य नाम हासिल करे। कितने हलाकू, चंगेज नादिर से जगत शत्रु ऐसे भी हो गये हैं जिनके काम की चर्चा सुन गर्भवती के गर्भ गिर पड़ते हैं। कितने नाम के लिये मर मिटते हैं। जग में मुँह उजला रहे बात न जाये कोई नाम न रखे एक की जगह चाहे दस लूटे पर ऐसा काम न बन पड़े कि सब लोग हँसें-नाम रखते हैं, नाम करते हैं, नाम धरते हैं, नाम धराते हैं, नाम पड़ता है, नाम चलता है, इत्‍यादि अनेक मुहावरें नाम के हमारी रोजमर्रे की बातचीत में कहे सुने जाते हैं पर इन सबों से नाम का काम ही की तरफ इशारा रहता है। ईश्‍वर न करे बुरे लोगों के लिये किसी का नाम निकल पड़े। दूसरा भी कोई बुरा काम करे तो भी 'नरक पड़ै को चन्‍दू चाचा' समाज में उसी की तरफ सबों की ओर से अंगुश्‍तनुमाई की जायेगी जो बुरे कामों के लिए प्रसिद्ध हो चुका है। पुलिस भी उसी को तके रहेगी। मजिस्‍ट्रेट साहब जुदा उसकी खोज में रहेंगे। यों ही भले काम के लिए नाम निकल गया तो चाहो दूसरा भी कोई वैसा ही काम करे किन्‍तु देसी परदेसियों में नाम उसी का लिया जायगा 'कटै सिपाही नाम सरदार का' 'नाम शाह कमा खा, नामी चोर मारा माय' जो बात बिना उस तरह के काम के होती है वह बराय नाम को कही जाती है। जैसा ईसाई मत के मानने वालों में ईशा पर विश्‍वास बराय नाम की है। इन दिनों के सभ्‍यों में सच्‍ची सभ्‍यता बराय नाम को है। मेनचेस्‍टर के बने कपड़ों के आगे देशी कपड़ों की कदर बराय नाम को है। इस समय के ब्राह्मणों में द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी आदि उपाधि बराय नाम है 'पढ़े लिखे ओनवौ ना ही नाम मुहम्‍मद फाजिल' चार वेद की कौन कहे चार अक्षर से भी भेंट नहीं है। कोरे लंठदास पर कहलाने को द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी। तरह इस साल वर्षा और खेती में उपज बराय नाम को है। दिवालदार रोजगारियों में ईमानदारी बराय नाम है। अंगरेज और हिन्‍दुस्‍तानियों के मुकाबिले हाकियों को इनसाफ बराय नाम है। कितनों का नाम दाम के कारण नाम के लायक कोई काम उनसे न भी बन पड़ा हो तो भी दाम ऐसी चीज है कि उनका नाम लेना कैसा वरन खुशामद करना पड़ता है। ऊपर की वर्षा समान गोधन दास तिनकौड़ी मल चिथरू दास के नामों में कौन-सी खूबसूरती है। इत्तिफाक से ऐसों के पास बहुत-सा रुपया जुड़ गया न आप पेट भर खाता है न दूसरों को खाते पहनते देख सकता है न उस रुपये से यह लोक परलोक का कोई काम निकलता है। समाज में यहाँ तक मनहूस समझा गया है कि सबेरे भूल से कहीं नाम जबान पर आ जाय तो दिन का दिन नष्‍ट हो जाय। ऐसों से सरोकार केवल दास ही के कारण लोग रखते हैं और हाजतरफा करने की भाँति उसके पास जाना पड़ता है इत्‍यादि काम और नाम का विवरण पढ़ने वालों के चित्त विनोदार्थ यहाँ पर लिखा गया। अंत में इतना और विशेष वक्‍तव्‍य है कि काम और नाम दोनों का साथ दाम पल्‍ले रहने से अच्‍छा निभ सकता है अर्थात दाम वाला चाहे तो अपने कामों से नाम पैदा करना उसके लिये जैसा सहज है वैसा औरों के लिये नहीं है।
जुलाई-अगस्‍त,1896 ई.
 

मैं तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक

मैं तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक
रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा
तुम ग़ज़ल बन गईं, गीत में ढल गईं
मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा

ज़िन्दगी के सभी रास्ते एक थे
सबकी मंज़िल तुम्हारे चयन तक रही
अप्रकाशित रहे पीर के उपनिषद्
मन की गोपन कथाएँ नयन तक रहीं
प्राण के पृष्ठ पर प्रीति की अल्पना
तुम मिटाती रहीं मैं बनाता रहा


एक ख़ामोश हलचल बनी ज़िन्दगी
गहरा ठहरा हुआ जल बनी ज़िन्दगी
तुम बिना जैसे महलों मे बीता हुआ
उर्मिला का कोई पल बनी ज़िन्दगी
दृष्टि आकाश में आस का इक दीया
तुम बुझाती रहीं, मैं जलाता रहा


तुम चली तो गईं, मन अकेला हुआ
सारी यादों का पुरज़ोर मेला हुआ
जब भी लौटीं नई ख़ुश्बुओं में सजीं
मन भी बेला हुआ, तन भी बेला हुआ
ख़ुद के आघात पर, व्यर्थ की बात पर
रूठतीं तुम रहीं मैं मनाता रहा

निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे !

कुछ छोटे सपनो के बदले,
बड़ी नींद का सौदा करने,
निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे 
!
वही प्यास के अनगढ़ मोती,
वही धूप की सुर्ख कहानी,
वही आंख में घुटकर मरती,
आंसू की खुद्दार जवानी,
हर मोहरे की मूक विवशता,चौसर के खाने क्या जाने
हार जीत तय करती है वे, आज कौन से घर ठहरेंगे
निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे !


कुछ पलकों में बंद चांदनी,
कुछ होठों में कैद तराने,
मंजिल के गुमनाम भरोसे,
सपनो के लाचार बहाने,

जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे,
उन के भी दुर्दम्य इरादे, वीणा के स्वर पर ठहरेंगे
निकल पडे हैं पांव अभागे,जाने कौन डगर ठहरेंगे 

                                                                                         - ओमप्रकाश  शर्मा

Friday, March 21, 2014

SANT KABEER BY OMPRAKASH SIR

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दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे कोय
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय 1

तिनका कबहुँ निंदिये, जो पाँयन तर होय
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय 2

माला फेरत जुग भया, फिरा मन का फेर
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर 3


गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय 4

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार
मानुष से देवत किया करत लागी बार 5

कबिरा माला मनहि की, और संसारी भीख
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख 6

सुख में सुमिरन ना किया, दु: में किया याद
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद 7

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय
मैं भी भूखा रहूँ, साधु ना भूखा जाय 8

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट 9

जाति पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान 10

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप 11

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय 12

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर 13

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय 14

कबीरा सोया क्या करे, उठि भजे भगवान
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान 15

शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन 16

माया मरी मन मरा, मर-मर गए शरीर
आशा तृष्णा मरी, कह गए दास कबीर 17

माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय 18

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय 19

नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग 20

जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल 21

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह बारम्बार
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि लागे डार 22

आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर 23

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब 24

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख 25

जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग 26

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय 27

आया था किस काम को, तु सोया चादर तान
सुरत सम्भाल गाफिल, अपना आप पहचान 28

क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह
साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह 29

गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच 30

दुर्बल को सताइए, जाकि मोटी हाय
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय 31

दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर 32

दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी का कौन
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन 33

ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय 34

हीरा वहाँ खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट
बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट 35

कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार
साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार 36

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय 37

मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे होय
मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय 38

सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप 39

अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ
मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात 40

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ 41

अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट 42

कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय
ह्रदय नाम जपेगा, यह जपनी क्या होय 43

पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप 44

बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार 45

हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध 46

राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस
रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश 47

जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच
वाके संग लागिये, खाले वटिया काँच 48

तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार 49

सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन
प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन 50

समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए 51

हंसा मोती विण्न्या, कुञ्च्न थार भराय
जो जन मार्ग जाने, सो तिस कहा कराय 52

कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा जाय
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय 53

वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल
बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल 54

कली खोटा जग आंधरा, शब्द माने कोय
चाहे कहँ सत आइना, जो जग बैरी होय 55

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति होय
भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय 56

जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय 57

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय 58

लागी लगन छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय 59

भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय 60

घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार
बाल सनेही सांइयाँ, आवा अन्त का यार 61

अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार 62

मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार
तुम दाता दु: भंजना, मेंरी करो सम्हार 63

प्रेम बाड़ी ऊपजै, प्रेम हाट बिकाय
राजा-परजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय 64

प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय
लोभी शीश दे सके, नाम प्रेम का लेय 65

सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग
कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग 66

सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु बोल
बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल 67

छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार 68

ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग
तेरा सांई तुझमें, बस जाग सके तो जाग 69

जा करण जग ढ़ूँढ़िया, सो तो घट ही मांहि
परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं 70

जबही नाम हिरदे घरा, भया पाप का नाश
मानो चिंगरी आग की, परी पुरानी घास 71

नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिंम नहीं शीतल होय
कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय 72

आहार करे मन भावता, इंदी किए स्वाद
नाक तलक पूरन भरे, तो का कहिए प्रसाद 73

जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति होय
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावें सोय 74

जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम
माता प्यारा बारका, भगति प्यारा नाम 75

दिल का मरहम ना मिला, जो मिला सो गर्जी
कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी 76

बानी से पह्चानिये, साम चोर की घात
अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह कई बात 77

जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव
कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव 78

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त 79

दाया भाव ह्र्दय नहीं, ज्ञान थके बेहद
ते नर नरक ही जायेंगे, सुनि-सुनि साखी शब्द 80

दाया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय
सांई के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय 81

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो समाय 82

छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम होय
अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय 83

जहाँ काम तहाँ नाम नहिं, जहाँ नाम नहिं वहाँ काम
दोनों कबहूँ नहिं मिले, रवि रजनी इक धाम 84

कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय 85

ऊँचे पानी टिके, नीचे ही ठहराय
नीचा हो सो भरिए पिए, ऊँचा प्यासा जाय 86

सबते लघुताई भली, लघुता ते सब होय
जौसे दूज का चन्द्रमा, शीश नवे सब कोय 87

संत ही में सत बांटई, रोटी में ते टूक
कहे कबीर ता दास को, कबहूँ आवे चूक 88

मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहि दोष
यह कबिरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष 89

जब ही नाम ह्रदय धरयो, भयो पाप का नाश
मानो चिनगी अग्नि की, परि पुरानी घास 90

काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय
काया वैध ईश बस, मर्म काहू पाय 91

सुख सागर का शील है, कोई पावे थाह
शब्द बिना साधु नही, द्रव्य बिना नहीं शाह 92

बाहर क्या दिखलाए, अनन्तर जपिए राम
कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम 93

फल कारण सेवा करे, करे मन से काम
कहे कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम 94

तेरा साँई तुझमें, ज्यों पहुपन में बास
कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास 95

कथा-कीर्तन कुल विशे, भवसागर की नाव
कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव 96

कबिरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा
कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा 97

तन बोहत मन काग है, लक्ष योजन उड़ जाय
कबहु के धर्म अगम दयी, कबहुं गगन समाय 98

जहँ गाहक ता हूँ नहीं, जहाँ मैं गाहक नाँय
मूरख यह भरमत फिरे, पकड़ शब्द की छाँय 99

कहता तो बहुत मिला, गहता मिला कोय
सो कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय 100
तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे सूर
तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान पूर 101

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                 With warm regards- Omprakash Sharma